Sunday, 28 December 2025

60 के बाद के साल आपकी ज़िंदगी: Tips for old aged

60 के बाद के साल आपकी ज़िंदगी: tips for old aged

मनोवैज्ञानिक हिदेकी वाडा ने "द 80-ईयर-ओल्ड वॉल" नाम की एक किताब पब्लिश की है। किताब पब्लिश होते ही इसकी 500,000 से ज़्यादा कॉपियां बिक गईं, जिससे यह उस समय की सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताब बन गई। अगर यह सेल्स ट्रेंड जारी रहता है, तो किताब की 1 मिलियन से ज़्यादा कॉपियां बिकेंगी, जिससे यह जापान की साल की सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताब बन जाएगी।

डॉ. वाडा, 61 साल के हैं, और बुज़ुर्गों की मानसिक बीमारियों के स्पेशलिस्ट डॉक्टर हैं। उन्होंने 80 साल के लोगों के लिए "खुशकिस्मत" ज़िंदगी के रहस्यों को 44 वाक्यों में बताया है, जो नीचे दिए गए हैं:

1. चलते-फिरते रहें।

2. गुस्सा आने पर गहरी सांस लें।

3. इतनी एक्सरसाइज़ करें कि आपका शरीर अकड़े नहीं।

4. गर्मियों में एयर कंडीशनिंग इस्तेमाल करते समय ज़्यादा पानी पिएं।
5. डायपर से चलने-फिरने में आसानी होती है।
6. आप जितना ज़्यादा चबाएंगे, आपका दिमाग और शरीर उतना ही ज़्यादा एक्टिव रहेगा।

7. याददाश्त कमज़ोर होना उम्र की वजह से नहीं, बल्कि दिमाग का इस्तेमाल न करने की वजह से होता है।
8. बहुत ज़्यादा दवा लेने की ज़रूरत नहीं है।
9. ब्लड प्रेशर और शुगर को बेवजह कम करने की ज़रूरत नहीं है।
10. अकेले रहना अकेलापन नहीं है; यह शांति से समय बिताना है।
11. आलस करना कोई शर्म की बात नहीं है।
12. ड्राइविंग लाइसेंस पर पैसे खर्च करने की ज़रूरत नहीं है (जापान में सीनियर सिटिज़न से उनके लाइसेंस वापस लेने के लिए एक कैंपेन चल रहा है)।
13. जो आपको पसंद है, वह करें; जो आपको पसंद नहीं है, वह न करें।
14. बुढ़ापे में भी नेचुरल इच्छाएं बनी रहती हैं।
15. किसी भी हालत में, हर समय घर पर न बैठें।
16. जो आपको पसंद है, वह खाएं; हल्का मोटापा बेहतर है।
17. सब कुछ ध्यान से करें।
18. जिन लोगों को आप पसंद नहीं करते, उनसे दोस्ती न करें।
19. हर समय टीवी न देखें।
20. बीमारी से लड़ने के बजाय, उसके साथ जीना सीखें।
21. "जब गाड़ी पहाड़ पर पहुँचती है, तो रास्ता दिख जाता है" - यह बुज़ुर्गों के लिए खुशी का जादुई मंत्र है।
22. ताज़े फल और सलाद खाएं।
23. नहाने का समय 10 मिनट से ज़्यादा नहीं होना चाहिए। 24. अगर आपको नींद नहीं आ रही है, तो खुद पर ज़ोर न डालें।
25. जो काम आपको खुशी देते हैं, उनसे दिमाग की एक्टिविटी बढ़ती है।
26. जो महसूस हो, वही कहें; ज़्यादा न सोचें।
27. जितनी जल्दी हो सके एक "फैमिली डॉक्टर" ढूंढ लें।
28. ज़्यादा सब्र या ज़बरदस्ती न करें; "बोल्ड सीनियर" होना भी बुरा नहीं है।
29. कभी-कभी अपना मन बदलना ठीक है।
30. ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव में, डिमेंशिया भगवान का दिया हुआ तोहफ़ा है।
60 के बाद के साल आपकी ज़िंदगी: tips for old aged
31. अगर आप सीखना बंद कर देंगे, तो आप बूढ़े हो जाएंगे।
32. शोहरत की चाहत न रखें; आपके पास जो है, वही काफी है।
33. मासूमियत बुज़ुर्गों के लिए होती है।
34. कोई चीज़ जितनी मुश्किल होती है, उतनी ही दिलचस्प हो जाती है।
35. धूप सेंकने से खुशी मिलती है।
36. ऐसे काम करें जिनसे दूसरों को फायदा हो।
37. आज का दिन आराम से बिताएं।
38. इच्छा ही लंबी उम्र की कुंजी है।
39. खुशी से जिएं।
40. आराम से सांस लें।
41. ज़िंदगी के सिद्धांत आपके अपने हाथों में हैं।
42. हर चीज़ को शांति से स्वीकार करें।
43. खुशमिजाज लोगों को सब प्यार करते हैं।
44. मुस्कान अच्छी किस्मत लाती है।

बूढ़ा होना कोई सीमा नहीं है - यह एक तोहफ़ा है। सही सोच और रोज़ाना की आदतों से, 60 के बाद के साल आपकी ज़िंदगी के सबसे फायदेमंद साल हो सकते हैं। आइए, बुढ़ापे को डर से नहीं, बल्कि ग्रेस, आभार और डॉ. वाडा द्वारा उदारता से शेयर की गई समझदारी के साथ अपनाएं।


Sunday, 23 November 2025

शयन विधान

शयन विधान
सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।

सोने की मुद्राऐं:  
           उल्टा सोये भोगी, 
           सीधा सोये योगी,
           दांऐं सोये रोगी,
           बाऐं सोये निरोगी।

शास्त्रीय विधान भी है।

आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की बात आती हैं,  

बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।

शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।

सोते समय कितने गायत्री मंन्त्र गिने जाए :-

"सूतां सात, उठता आठ : सोते वक्त सात भय को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।

"सात भय:-" 
इहलोक,परलोक,आदान,
अकस्मात ,वेदना,मरण ,
अश्लोक (भय)

दिशा घ्यान:- 

दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं चाहिए । यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,व असंख्य बीमारियाँ होती है।

यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।

1:- पूर्व ( E ) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।

2:-दक्षिण ( S ) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है ।

3:-पश्चिम( W ) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।
 
4:-उत्तर ( N ) में मस्तक रखकर सोने से हानि मृत्यु कारक होती है ।

अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है ।

विशेष शयन की सावधानियाँ:-

1:-मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।

2:-संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी चाहिए।

3:-शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी चाहिए।

*4:-द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।

5:-ह्रदय पर हाथ रखकर,छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।

6:-सूर्यास्त के पहले सोना नहीं चाहिए।

7:-पाँव की और शय्या ऊँची हो तो अशुभ है। केवल चिकित्स उपचार हेतु छूट हैं ।

8:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है।

9:- सोते सोते पढना नहीं चाहिए।

10 :-ललाट पर तिलक रखकर सोना अशुभ है। (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है। )
 
 

Tuesday, 4 July 2023

निगुरे नारद मुनि की रोचक कथा


"गुरु गूंगे गुरू बावरे गुरू के रहिये दास "
एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए ! 
भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो ! 
जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो ! 
भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है ! 
यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! नारायण! बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो !
नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ ?
यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया ! 
मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस भगवान के पास गए और कहा हे भगवान! मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा !
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान! इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये !भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा !
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया !😌☝
✨नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है ! ✨
गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !
गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ,अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा "स्वयं गुरु" भी नहीं कर सकते ! 
एक प्रसंग है कि एक पंडीत ने धन्ने भगत को एक साधारण पत्थर देकर कहा  इसे भोग लगाया करो एक दिन भगवान कृष्ण दर्शन देगे ! उस धन्ने भक्त के विश्वास से एक दिन उस पत्थर से भगवान प्रकट हो गए ! फिर गुरु पर तो वचन विश्वास रखने वाले का उद्धार निश्चित है।
        🙏🙏🌸जयश्रीसितारामजी की🌸🙏🙏
                 💐🌹🌹 💐

Wednesday, 15 December 2021

वाराणसी का कालानुक्रमिक इतिहास (काशी)

वाराणसी का कालानुक्रमिक इतिहास (काशी)
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• यह ज्ञात नहीं है कि वाराणसी शहर की स्थापना कब हुई थी लेकिन यह शहर प्रारंभिक वैदिक काल से अस्तित्व में था। यह शहर वारणा और असी नदियों से घिरा हुआ था।
• वाराणसी पर लगभग 11400 ईसा पूर्व असुर राजा क्षेमक का शासन था। हर्यश्व के पिता पांचाल राजकुमार दिवोदास ने क्षेमक को हराया।
• राजा हर्यश्व और उनके वंशजों ने लगभग 11350-11150 ईसा पूर्व वाराणसी पर शासन किया।
• हैहय राजाओं ने वाराणसी पर आक्रमण किया और राजा हर्यश्व युद्ध में मारे गए।
• हर्यश्व के पुत्र सुदेव और उनके पोते दिवोदास ने हैहय को हराकर वाराणसी शहर को मजबूत किया।
• दिवोदास महादेव शिव के वरिष्ठ समकालीन थे। शिव ने वाराणसी आकर वहां अपना निवास स्थापित किया। पार्वती को पहले तो यह शहर पसंद नहीं आया लेकिन शिव ने उनसे कहा, "मैं अपना घर नहीं छोड़ूंगा और मेरा घर कभी नहीं छोड़ा जाएगा (अविमुक्त)"। यह शिव का घर ठीक वहीं स्थित था जहां आज अविमुक्तेश्वर-ज्ञान-वापी मंदिर (औरंगजेब द्वारा मस्जिद में परिवर्तित) खड़ा है।
• हर्यश्व वंश (11350-11150 ईसा पूर्व): हर्यश्व , सुदेव, दिवोदास, प्रतर्दन, वत्स (कुवलाश्व), अलर्क और सन्नति।
• दिवोदास के परपोते अलर्क (राजा वत्स और मदालसा के पुत्र) को ऋषि अगस्त्य (11270-11180 ईसा पूर्व) की पत्नी लोपामुद्रा ने आशीर्वाद दिया था।
• राजा सन्नति के बाद, काश (अयु के परपोते और क्षत्रवृद्ध के पौत्र) ने चंद्र वंश के शासन की स्थापना की वाराणसी में किया और शहर का पुनर्निर्माण या विस्तार किया। यही कारण है कि वाराणसी को काशी (काश ​​द्वारा निर्मित) के नाम से जाना जाने लगा।
• ऋग्वेद काल के काशी राजा काश, काश्य, दिर्घतपस्, धन्व, धन्वंतरि और अजातशत्रु।
• धन्वंतरि (10950 ईसा पूर्व) आयुर्वेद की एक शाखा के संस्थापक थे और सुश्रुत उनके शिष्य थे।
• काशी राजा अजातशत्रु विदेह जनपद के राजा जनक के समकालीन थे।
• अथर्ववेद की पिप्पलाद संहिता काशी को संदर्भित करती है। शतपथ ब्राह्मण का उल्लेख है कि शतानिक सत्रजित ने काशी के राजा को वशीभूत किया, सात्वतों के वंश के भरत ने काशी पर विजय प्राप्त की और धृतराष्ट्र (काशी के वैदिक राजा) और अजातशत्रु काशी के राजा थे।
• उत्तर वैदिक, रामायण और रामायण के बाद के युगों के दौरान धीरे-धीरे, कोसल और विदेह जनपद काशी जनपद पर हावी हो गए।
• महाभारत काल में काशीराज काशी के राजा थे। भीमसेन ने काशी राजा को हराया।
• पुराणों के अनुसार महाभारत काल के बाद काशी के 25 राजा हुए।
• राजा शिशुनाग (2024-1984 ईसा पूर्व) काशी के राजा थे जिन्होंने मगध पर विजय प्राप्त की और मगध में शिशुनाग वंश के शासन की स्थापना की। उनके पुत्र ने काशी पर राज्य किया जब शिशुनाग मगध पर शासन कर रहे थे।
• प्रतीत होता है, राजा ब्रह्मदत्त और उनके पुत्र प्रसेनजित बुद्ध के जीवनकाल (1944-1864 ईसा पूर्व) के दौरान काशी पर शासन कर रहे थे।
• मगध के महापद्म नंद ने 1662 ईसा पूर्व के आसपास काशी के राज्य पर कब्जा कर लिया।
• राजघाट की खुदाई में अविमुक्तेश्वर (9-10 शताब्दी ईसा पूर्व) की एक मुहर मिली थी जो प्राचीन अविमुक्तेश्वर मंदिर के अस्तित्व को इंगित करती है। राजधानी
• आदि शंकराचार्य (568-536 ईसा पूर्व) ने काशी का दौरा किया।मण्डन मिश्र वाराणसी में रह रहे थे।
• बाद में गुप्त राजा वैन्या गुप्त ने अविमुक्तेश्वर मंदिर का पुनर्निर्माण किया।
• चीनी यात्री हुआन त्सांग ने काशी के मंदिर का उल्लेख किया है।
• कलचुरी-छेदी राजा कर्णदेव (389-419 सीई) ने वाराणसी को अपना बनाया और कर्णदेव के शासनकाल के दौरान कश्मीर कवि बिल्हाना ने वाराणसी का दौरा किया।
• अविमुक्तेश्वर मंदिर को मुहम्मद गोरी और उसके दास ऐबक ने ध्वस्त कर दिया था।
 
• मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था लेकिन जौनपुर के शर्की सुल्तान द्वारा फिर से ध्वस्त कर दिया गया था।
• वाराणसी में मंदिर का पुनर्निर्माण नारायण भट्ट ने अकबर के समय में टोडल मल के संरक्षण में किया था।
• औरंगजेब ने अविमुक्तेश्वर मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उस पर एक मस्जिद का निर्माण किया।
• चूंकि अविमुक्तेश्वर मंदिर को औरंगजेब द्वारा अपवित्र किया गया था और उस पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया था, अहिल्याबाई होल्कर ने 1776-78 इसी के आसपास वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण किया।
• 1835 ई. में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के गुंबद और दरवाजों पर चढ़ाने के लिए मंदिर को 1 टन सोना दान में दिया था।
• प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण किया और 13 दिसंबर 2021 को उद्घाटन किया।

Friday, 16 October 2020

हिन्दू समाज की वे परम्पराए जिन्हें सहेजना जरूरी

हिन्दू समाज की वे परम्पराए जिन्हें सहेजना जरूरी 


एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं..


 वैज्ञानिक कारण..!
     
एक दिन डिस्कवरी पर
  जेनेटिक बीमारियों से
     सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम था।

         उस प्रोग्राम में
एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा कि
  जेनेटिक बीमारी न हो
  इसका एक ही इलाज है।
  
और वो है
          *"सेपरेशन ऑफ़ जींस"*
          
मतलब अपने नज़दीकी रिश्तेदारों में
  विवाह नहीं करना चाहिए
क्योंकि 
नज़दीकी रिश्तेदारों में
Genes separation (विभाजन) नहीं हो पाता
 और
Genes linked बीमारियाँ जैसे
हिमोफ़ीलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और
एल्बोनिज्म होने का
100% चांस होता है ..

फिर बहुत ख़ुशी हुई
जब उसी कार्यक्रम में
ये दिखाया गया कि 
आखिर
   *"हिन्दू धर्म"* में
     हज़ारों-हज़ार साल पहले
    
       जींस और डीएनए के बारे में
       
       कैसे लिखा गया है ?
       
    हिंदुत्व में गोत्र होते हैं
      
और
         एक गोत्र के लोग
आपस में शादी नहीं कर सकते
ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. 

    उस वैज्ञानिक ने कहा कि
    
आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा कि

            "हिन्दू धर्म ही"
विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो
    "विज्ञान पर आधारित" है !
    

*हिंदू परम्पराओं से जुड़े*


  *ये वैज्ञानिक तर्क:*
       
1-
*कान छिदवाने की परम्परा*

     भारत में लगभग सभी धर्मों में
        कान छिदवाने की
            परम्परा है।

*वैज्ञानिक तर्क-*

दर्शनशास्त्री मानते हैं कि
 इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है।
जबकि
डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली
अच्छी होती है और
कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का
रक्त संचार नियंत्रित रहता है।

2-

*माथे पर कुमकुम/तिलक*


   महिलाएँ एवं पुरुष माथे पर
      कुमकुम या तिलक लगाते हैं ।

*वैज्ञानिक तर्क-*

आँखों के बीच में
माथे तक एक नस जाती है।
कुमकुम या तिलक लगाने से
उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है।
माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उँगली से प्रेशर पड़ता है,
तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली माँसपेशी सक्रिय हो जाती है।
इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता है।

3- 
*ज़मीन पर बैठकर भोजन करना*

   भारतीय संस्कृति के अनुसार
   ज़मीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है।

*वैज्ञानिक तर्क-*

पालथी मारकर बैठना
एक प्रकार का योगासन है।
इस पोज़िशन में बैठने से

मस्त‍िष्क शांत रहता है और
भोजन करते वक्त
अगर दिमाग शांत हो तो
 पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोज़िशन में बैठते ही
खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल
पेट तक जाता है, कि
वह भोजन के लिये तैयार हो जाये।

4-
*हाथ जोड़कर नमस्ते करना*

जब किसी से मिलते हैं तो
 हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।

*वैज्ञानिक तर्क-*

जब सभी उँगलियों के शीर्ष
एक दूसरे के संपर्क में आते हैं
और उन पर दबाव पड़ता है।
एक्यूप्रेशर के कारण उसका
सीधा असर
हमारी आँखों, कानों और दिमाग पर होता है,
ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें।
दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाय अगर आप नमस्ते करते हैं
तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुँच सकते।
अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुँचेगा।

5-
*भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से*

   जब भी कोई धार्मिक या
     पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो
       भोजन की शुरुआत तीखे से और
          अंत मीठे से होता है।

*वैज्ञानिक तर्क-*

तीखा खाने से
हमारे पेट के अंदर
पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं
इससे
पाचन तंत्र ठीक से संचालित होता है
अंत में
मीठा खाने से
अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है
इससे पेट में जलन नहीं होती है।

6-
*पीपल की पूजा*

तमाम लोग सोचते हैं कि
पीपल की पूजा करने से
भूत-प्रेत दूर भागते हैं। 

*वैज्ञानिक तर्क-*

इसकी पूजा इसलिये की जाती है,
ताकि
इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े
और
उसे काटें नहीं
पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो
रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है।

7-
*दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना*

दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है
तो लोग कहते हैं कि
बुरे सपने आयेंगे
भूत प्रेत का साया आयेगा, पूर्वजों का स्थान आदि
इसलिये
उत्तर की ओर पैर करके सोएँ। 
*वैज्ञानिक तर्क-*

जब हम
उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं,
तब
हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है।
शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा
दिमाग की ओर संचारित होने लगता है
इससे अलज़ाइमर,
पारकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है,
यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।

8-
*सूर्य नमस्कार*

हिंदुओं में
सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाने,
नमस्कार करने की परम्परा है। 
*वैज्ञानिक तर्क-*

पानी के बीच से आने वाली
सूर्य की किरणें जब
आँखों में पहुँचती हैं तब 
हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है।

9-
*सिर पर चोटी*

हिंदू धर्म में
ऋषि मुनि सिर पर चुटिया रखते थे,
आज भी लोग रखते हैं।
*वैज्ञानिक तर्क-*

जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है,
उस जगह पर
दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं।
इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है
और
इंसान को क्रोध नहीं आता एवं
सोचने की क्षमता बढ़ती है।

10-
*व्रत रखना*

कोई भी पूजा-पाठ, त्योहार होता है तो
लोग व्रत रखते हैं।

*वैज्ञानिक तर्क-*

आयुर्वेद के अनुसार
व्रत करने से
पाचन क्रिया अच्छी होती है और
फलाहार लेने से
शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है
यानी
 उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं।
 शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से
कैंसर का खतरा कम होता है।
हृदय संबंधी रोगों,मधुमेह,आदि रोग भी
जल्दी नहीं लगते।

11-
*चरण स्पर्श करना*

हिंदू मान्यता के अनुसार
जब भी आप किसी बड़े से मिलें तो
उसके चरण स्पर्श करें।
यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं
ताकि वे बड़ों का आदर करें।
*वैज्ञानिक तर्क-*

मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा
हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए
एक चक्र पूरा करती है।
इसे
कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं।
इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है,
या तो
बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक
 या फिर
छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।

12-
*क्यों लगाया जाता है सिंदूर*

सुहागिन हिंदू महिलाएँ सिंदूर लगाती हैं।
*वैज्ञानिक तर्क-*
सिंदूर में
हल्दी,चूना और मरकरी होता है,
यह मिश्रण
शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है।
चूँकि 
इससे यौन उत्तेजनाएँ भी बढ़ती हैं
इसीलिये
विधवा औरतों के लिये
सिंदूर लगाना वर्जित है।
इससे स्ट्रेस कम होता है।

13-
*तुलसी के पेड़ की पूजा*

तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है।
सुख शांति बनी रहती है। 
*वैज्ञानिक तर्क-*
 तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है।
लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा तो
इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और
उससे बीमारियाँ दूर होती हैं।

हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क सहेज कर रखें

Thursday, 24 September 2020

कलयुग का ज्ञान

युधिष्ठिर को कलयुग का ज्ञान था कि क्या होगा ?

पाँचो पाण्डव एवं द्रोपदी जंगल मे छूपने का स्थान ढूंढ रहे थे। उधर शनिदेव की आकाश मंडल से पाण्डवों पर नजर पड़ी शनिदेव के मन विचार आया कि इन 5 में बुद्धिमान कौन है परीक्षा ली जाय ।शनिदेव ने एक माया का महल बनाया कई योजन दूरी में उस महल के चार कोने थे, पूरब, पश्चिम, उतर, दक्षिण।

1--- अचानक भीम की नजर महल पर पड़ी और वो आकर्षित हो गया, भीम, यधिष्ठिर से बोला- भैया मुझे महल देखना है भाई ने कहा जाओ। भीम महल के द्वार पर पहुंचा वहाँ शनिदेव दरबान के रूप में खड़े थे, भीम बोला- मुझे महल देखना है!

 शनिदेव ने कहा- महल की कुछ शर्त है ।

1– शर्त महल में चार कोने हैं आप एक ही कोना देख सकते हैं।
2-शर्त महल में जो देखोगे उसकी सार सहित व्याख्या करोगे।
3-शर्त अगर व्याख्या नहीं कर सके तो कैद कर लिए जाओगे।

 भीम ने कहा- मैं स्वीकार करता हूँ ऐसा ही होगा। और वह महल के पूर्व छोर की ओर गया । वहां जाकर उसने अद्भूत पशु पक्षी और फूलों एवं फलों से लदे वृक्षों का नजारा देखा, आगे जाकर देखता है कि तीन कुंए है अगल-बगल में छोटे कुंए और बीच में एक बडा कुआ। बीच वाला बड़े कुंए में पानी का उफान आता है और दोनों छोटे खाली कुओं को पानी से भर देता है। फिर कुछ देर बाद दोनों छोटे कुओं में उफान आता है तो खाली पड़े बड़े कुंए का पानी आधा रह जाता है इस क्रिया को भीम कई बार देखता है पर समझ नहीं पाता और लौटकर दरबान के पास आता है।

 दरबान – क्या देखा आपने ?

 भीम- महाशय मैंने पेड़ पौधे पशु पक्षी देखा वो मैंने पहले कभी नहीं देखा था जो अजीब थे। एक बात समझ में नहीं आई छोटे कुंए पानी से भर जाते हैं बड़ा क्यों नहीं भर पाता ये समझ में नहीं आया।

 दरबान – आप शर्त के अनुसार बंदी हो गये हैं और बंदी घर में बैठा दिया।

2---अर्जुन आया बोला- मुझे महल देखना है, दरबान ने शर्त बता दी और अर्जुन पश्चिम वाले छोर की तरफ चला गया। आगे जाकर अर्जुन क्या देखता है।

एक खेत में दो फसल उग रही थी एक तरफ बाजरे की फसल दूसरी तरफ मक्का की फसल । बाजरे के पौधे से मक्का निकल रही तथा मक्का के पौधे से बाजरी निकल रही । अजीब लगा कुछ समझ नहीं आया वापिस द्वार पर आ गया।

 दरबान ने पूछा क्या देखा,

अर्जुन बोला महाशय सब कुछ देखा पर बाजरा और मक्का की बात समझ में नहीं आई।

 दरबान ने कहा शर्त के अनुसार आप बंदी हैं ।

 3---नकुल आया बोला मुझे महल देखना है। फिर वह उत्तर दिशा की और गया वहाँ उसने देखा कि बहुत सारी सफेद गायें जब उनको भूख लगती है तो अपनी छोटी बछियों का दूध पीती है उसे कुछ समझ नहीं आया द्वार पर आया ।

 दरबान ने पूछा क्या देखा ?

 नकुल बोला महाशय गाय बछियों का दूध पीती है यह समझ नहीं आया तब उसे भी बंदी बना लिया।

 4---सहदेव आया बोला मुझे महल देखना है और वह दक्षिण दिशा की और गया अंतिम कोना देखने के लिए क्या देखता है वहां पर एक सोने की बड़ी शिला एक चांदी के सिक्के पर टिकी हुई डगमग डोले पर गिरे नहीं छूने पर भी वैसे ही रहती है समझ नहीं आया वह वापिस द्वार पर आ गया और बोला सोने की शिला की बात समझ में नहीं आई तब वह भी बंदी हो गया।

 चारों भाई बहुत देर से नहीं आये तब युधिष्ठिर को चिंता हुई वह भी द्रोपदी सहित महल में गये। भाइयों के लिए पूछा तब दरबान ने बताया वो शर्त अनुसार बंदी है।

 युधिष्ठिर बोला भीम तुमने क्या देखा ? भीम ने कुंऐ के बारे में बताया

तब युधिष्ठिर ने कहा- यह कलियुग में होने वाला है एक बाप दो बेटों का पेट तो भर देगा परन्तु दो बेटे मिलकर एक बाप का पेट नहीं भर पायेंगे। भीम को छोड़ दिया।

 अर्जुन से पुछा तुमने क्या देखा ? उसने फसल के बारे में बताया

युधिष्ठिर ने कहा- यह भी कलियुग में होने वाला है। वंश परिवर्तन अर्थात ब्राह्मण के घर शूद्र की लड़की और शूद्र के घर बनिए की लड़की ब्याही जायेंगी। अर्जुन भी छूट गया।

 नकुल से पूछा तुमने क्या देखा तब उसने गाय का वृतान्त बताया ।

 तब युधिष्ठिर ने कहा- कलियुग में माताऐं अपनी बेटियों के घर में पलेंगी बेटी का दाना खायेंगी और बेटे सेवा नहीं करेंगे। तब नकुल भी छूट गया।

 सहदेव से पूछा तुमने क्या देखा, उसने सोने की शिला का वृतांत बताया,

 तब युधिष्ठिर बोले- कलियुग में पाप धर्म को दबाता रहेगा परन्तु धर्म फिर भी जिंदा रहेगा खत्म नहीं होगा।

आज के कलयुग में यह सारी बातें सच साबित हो रही है

Saturday, 19 September 2020

प्रारब्ध

कैसे एक गृहणी को खेत से हीरे जवारात के मटके मिले 

एक गृहस्थ भक्त अपनी जीविका का आधा भाग घर में दो दिन के खर्च के लिए पत्नी को देकर अपने गुरुदेव के पास गया । 

दो दिन बाद उसने अपने गुरुदेव को निवेदन किया के अभी मुझे घर जाना है। मैं धर्मपत्नी को दो ही दिन का घर खर्च दे पाया हूं । घर खर्च खत्म होने पर मेरी पत्नी व बच्चे कहाँ से खायेंगे 

गुरुदेव के बहुत समझाने पर भी वो नहीं रुका। तो उन्होंने उसे एक चिट्ठी लिख कर दी। और कहा कि रास्ते में मेरे एक भक्त को देते जाना। 

वह चिट्ठी लेकर भक्त के पास गया। उस चिट्ठी में लिखा था कि जैसे ही मेरा यह भक्त तुम्हें ये खत दे तुम इसको 6 महीने के लिए मौन साधना की सुविधा वाली जगह में बंद कर देना। 

उस गुरु भक्त ने वैसे ही किया। वह गृहस्थी शिष्य 6 महीने तक अन्दर गुरु पद्धत्ति नियम, साधना करता रहा परंतु कभी कभी इस सोच में भी पड़ जाता कि मेरी पत्नी का क्या हुआ, बच्चों का क्या हुआ होगा ?? 

उधर उसकी पत्नी समझ गयी कि शायद पतिदेव वापस नहीं लौटेंगे।तो उसने किसी के यहाँ खेती बाड़ी का काम शुरू कर दिया। 

खेती करते करते उसे हीरे जवाहरात का एक मटका मिला। 

उसने ईमानदारी से वह मटका  खेत के मालिक को दे दिया। 

उसकी ईमानदारी से खुश होकर खेत के मालिक ने उसके लिए एक अच्छा मकान बनवा दिया व आजीविका हेतु ज़मीन जायदात भी दे दी । 

अब वह अपनी ज़मीन पर खेती कर के खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगी। 

जब वह शिष्य 6 महिने बाद घर लौटा तो देखकर हैरान हो गया और मन ही मन गुरुदेव के करुणा कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगा कि सद्गुरु ने मुझे यहाँ अहंकार मुक्त कर दिया । 

मै समझता था कि मैं नहीं कमाकर दूंगा तो मेरी पत्नी और बच्चों का क्या होगा ?? 

करनेवाला तो सब परमात्मा है। लेकिन झूठे अहंकार के कारण मनुष्य समझता है कि मैं करनेवाला हूं। 

वह अपने गुरूदेव के पास पहुंचा और उनके चरणों में पड़ गया। गुरुदेव ने उसे समझाते हुए कहा बेटा हर जीव का अपना अपना प्रारब्ध  होता है और उसके अनुसार उसका जीवन यापन होता है। मैं भगवान के भजन में लग जाऊंगा तो मेरे घरवालों का क्या होगा ??  

मैं सब का पालन पोषण करता हूँ मेरे बाद उनका क्या होगा यह अहंकार मात्र है। 

वास्तव में जिस परमात्मा ने यह शरीर दिया है उसका भरण पोषण भी वही परमात्मा करता है। 

कहानी का सार है इंसान को कभी गरुर नही करना चाहिए कि मै ही हू सब करने वाला करता तो भगवान है। इंसान तो अपने अहंकार मे रहता है।

प्रारब्ध  पहले रच्यो पीछे भयो शरीर
तुलसी चिंता क्या करे भज ले श्री रघुवीर।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

Wednesday, 16 September 2020

शंका कैसे पैदा होती है

शंका कैसे पैदा होती है 

एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:-  बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?
सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं! 
उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? 
क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?

लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।
थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।। 
फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।
एक दूसरे को लानतें भेजी।। 
मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।
जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।

रवि ने अपने जिगरी दोस्त पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो
पवन- फलां दुकान में।। 
रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक?
पवन-18 हजार।।
रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ?
पवन- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।
मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद पवन अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। पवन ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।

एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही?
बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।।
पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।
इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।।

याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।। 

हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।।जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।।
वगैरा वगैरा।।
इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।।
जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में 
नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।
आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।। 
वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।।
ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।। 
लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो।।

      
          
आंख बंद करके एक बार विचार जरूर करें।

Saturday, 9 May 2020

नफरत का परिणाम

।।नफरत का परिणाम।।
समुन्द्र में भारण्ड नाम का एक विचित्र पक्षी रहता था,जिसके दो मुख व एक पेट था।एक दिन भारण्ड समुन्द्र में नहा रहा था कि एक छोटा-सा फल तैरता हुआ  आया और एक मुख ने उसे अपनी जीभ पर रखकर खाया तो वह फल बड़ा ही मीठा लगा तो वह अपने श्रीमुख से बोला,"ओह, कितना मीठा है यह फल! आज तक इतना स्वादिष्ट फल कभी खाने को नही मिला।"
दूसरे मुख ने जब यह सब सुना तो उसने अपना मुख बिगाड़ते हुए बोला,"अरे नीच,तू बड़ा स्वार्थी है।तूने मुझे उस फल का स्वाद भी नही कराया।"
पहला मुख हँसकर बोला,"अरे,तो इतना बिगड़ता क्यों है?सोच तो,मैं और तू क्या अलग-अलग है?चाहे मैं खाऊँ, चाहे तू खाए, बात एक ही है क्योंकि पेट तो दोनों का एक ही है।क्यो बेवजह अपने-पराए का भेदभाव खड़ा करता है।?"
दूसरे मुख ने प्रत्युत्तर में कुछ नही कहा लेकिन मन ही मन पहले मुख से खूब नफरत करने लगा और इस अपमान का बदला लेने का उपाय सोचने लगा।एक दिन उसके हाथ एक विषफल आया और पहले मुख को दिखाकर बोला,"अरे दुष्ट!देख मुझे भी आज एक फल मिला है और मैं भी तुझे कुछ नही दूँगा।"
पहला मुख चिल्लाया,"अरे भैया!यह क्या गजब करता है?इसे मत खा।यह विषफल है।इसके खाने से मैं ही नहीं तू भी मर जायेगा।"
दूसरा मुख बोला,"कुछ भी हो ,मैं इस फल को जरूर खाऊंगा और तेरे अपमान का बदला लूँगा।तभी मुझे शांति मिलेगी।बाद में मरु या जीऊं,इसकी मुझे चिंता नही।"
पहले मुख ने बहुत अनुनय-विनय किया लेकिन दूसरे मुख ने उसकी एक न सुनी और विषफल खा ही लिया।परिणाम वही हुआ,जो होना था।फल का विष पेट में जाकर फैल गया और  भारण्ड पक्षी छटपटाकर मर गया।
इस कहानी से सीख मिलती है कि  नफरत-ईर्ष्या से सदा हानि ही होती है। संत-महापुरुष और सज्जन लोग अपने जीवन में कदापि किसी से नफरत नही करते है।वे अजातशत्रु बनकर अपना जीवन खुशी से जीते हैं और जीवन में खूब यश-कीर्ति पाते हैं।

Saturday, 25 April 2020

Lord Parshurama

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभिषण:।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ।।
Lord Parshurama is the sixth avatar of Vishnu in Hinduism. Born as a brahmin, Parashurama carried traits of a Kshatriya and is often regarded as a Brahmin-Kshatriya. He carried a number of Kshatriya traits, which included aggression, warfare and valor; also, serenity, prudence and patience. He, along with only Hanuman and Indrajita, is considered to be one of the very few Atimaharathi warriors ever born on Earth. Like other incarnations of Vishnu, he was foretold to appear at a time when overwhelming evil prevailed on earth. The Kshatriya class, with weapons and power, had begun to abuse their power, take what belonged to others by force and tyrannize people. Parashurama corrects the cosmic equilibrium by destroying these Kshatriya warriors.

According to Hindu legends, Parashurama was born to a Brahmin sage Jamadagni and his wife Renuka, living in a hut. They have a celestial cow called Surabhi which gives all they desire. A king named Kartavirya Arjuna learns about it and wants it. He asks Jamadagni to give it to him, but the sage refuses. While Parashurama is away from the hut, the king takes it by force. Parashurama learns about this crime, and is upset. With his axe in his hand, he challenges the king to battle. They fight, and Parushama kills the king, according to the Hindu History. The warrior class challenges him, and he kills all his challengers. The legend likely has roots in the ancient conflict between the Brahmin varna (class), with religious duties, and the Kshatriya varna, with warrior and enforcement roles.

Friday, 17 April 2020

दानी कर्ण और चंचल मन।

।।दानी कर्ण और चंचल मन।।
महाभारत में कर्ण की एक कहानी है।एक दिन कर्ण तेल से स्नान कर रहे थे।किसी ने उनसे तेल का सोने का पात्र मांगा और कर्ण ने तुरंत बाएं हाथ से पात्र दे दिया। पात्र लेने वाले ने आपत्ति जताई कि "बाएं हाथ से कुछ सामान देना सही नही है।" यह सुनकर कर्ण ने स्पष्ट किया कि "उनका दायाँ हाथ तेल से छना हुआ है और जब तक वे हाथ धोने जाते,हो सकता है कि उनका चंचल मन कही पलट जाय।"
    कर्ण ने बड़े विनम्र भाव से कहा कि,"हे महाशय,आप मेरा यह स्वर्ण पात्र सहर्ष ग्रहण कीजिए।"
यदि जीवन में दान करना चाहते हो तो कर्ण की तरह कीजिए, क्योकि हममें से ज्यादातर लोगों का मन चंचल होता है जो हमारे अच्छे फैसले को पलट सकता है। 
दान की महिमा अपरंपार है।दान करने से स्वर्ग जैसा सुख और आनंद प्राप्त होता है।
आप सभी वंदनीय बंधुजन-बहनों को मेरा प्रातःकालीन सादर अभिनंदन-वन्दन सा।

मयूर पंख


  वनवास के दौरान माता सीताजी को 
पानी की प्यास लगी, तभी श्रीरामजी ने 
चारों ओर देखा, तो उनको दूर-दूर तक 
     जंगल ही जंगल दिख रहा था.
 कुदरत से प्रार्थना करी ~ हे जंगलजी !
     आसपास जहाँ कहीं पानी हो,
  वहाँ जाने का मार्ग कृपया सुझाईये.

      तभी वहाँ एक मयूर ने आकर  
 श्रीरामजी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर 
    एक जलाशय है. चलिए मैं आपका 
      मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ,  किंतु 
      मार्ग में हमारी भूल चूक होने की 
                 संभावना है.

     श्रीरामजी ने पूछा ~ वह क्यों ? 
      तब मयूर ने उत्तर दिया कि ~
   मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप 
   चलते  हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में 
 मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ 
     जाऊंगा. उस के सहारे आप 
   जलाशय तक पहुँच ही जाओगे.

  इस बात को हम सभी जानते हैं कि
  मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं 
    एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं.
     अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध 
         पंखों को बिखेरेगा, तो 
        उसकी मृत्यु हो जाती है.

    और वही हुआ. अंत में जब मयूर 
   अपनी अंतिम सांस ले रहा होता है,
      उसने मन में ही कहा कि 
    वह कितना भाग्यशाली है, कि 
    जो जगत की प्यास बुझाते हैं, 
  ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे 
          सौभाग्य प्राप्त हुआ.
        मेरा जीवन धन्य हो गया.
 अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नहीं रही.

तभी भगवान श्रीराम ने मयूर से कहा कि 
 मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरकर, 
   मुझ पर जो ऋणानुबंध चढ़ाया है,
     मैं उस ऋण को अगले जन्म में 
              जरूर चुकाऊंगा ....

     *★मेरे सिर पर धारण करके★*

        तत्पश्चात अगले जन्म में 
     श्री कृष्ण अवतार में उन्होंने 
    अपने माथे पर मयूर पंख को 
      धारण कर वचन अनुसार 
    उस मयूर का ऋण उतारा था.

       

       तात्पर्य यही है कि  
 अगर भगवान को ऋण उतारने के लिए 
        पुनः जन्म लेना पड़ता है, तो 
  हम तो मानव हैं. न जाने हम कितने ही 
          ऋणानुबंध से बंधे हैं.
     उसे उतारने के लिए हमें तो 
   कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे.
          ~~  अर्थात  ~~
    जो भी भला हम कर सकते हैं,
      इसी जन्म में हमें करना है।

Saturday, 11 April 2020

घास का तिनका

घास का तिनका

रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जो हर किसी को नहीं मालूम क्योंकि आज तक हमने हमारे ग्रंथो को 
सिर्फ पढ़ा, समझने की कोशिश नहीं की।
रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था, लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी। यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को 
भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ,
रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी ने उससे कहा आप  तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ?
रावण बोला- जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी ।
रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण भी कैसे समझ पाता !
रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर-घूर कर देखने लगती हो,
क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है?  
रावण के इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी और उनकी आँखों से आसुओं की धार बह पड़ी।
इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि
जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ,तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ। बहुत उत्सव मनाया गया।    *प्रथानुसार नव वधू विवाह पश्चात जब ससुराल आती है तो उसके हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर में मिठास बनी रहे।* 
इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथों से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार, राजा दशरथ एवं तीनों रानियों  सहित चारों भाईयों और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे।
माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया। सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली,सीता जी बड़े गौर से सब देख रही थी।
ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया, जिसे माँ सीता जी ने देख लिया। लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें? ये प्रश्न आ गया। माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा  वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया। सीता जी ने सोचा 'अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा'।
लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी 
के इस चमत्कार को देख रहे थे। फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुचकर माँ सीता जी को बुलवाया ।
फिर उन्होंने सीताजी से कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था ।
आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना।
आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना।
इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी।
*तृण धर ओट कहत वैदेही*
*सुमिरि अवधपति परम् सनेही*

*यही है उस तिनके का रहस्य* ! 
इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर 
सकती थी, लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही !
ऐसी विशालहृदया थीं हमारी जानकी माता !
जय हो प्रभु श्री राम जी की...
साभार
       ✍️  वेद प्रकाश पांडेय जी(सनातन धर्म प्रचारक)

Friday, 7 February 2020

19 ऊंट की कहानी

एक गाँव में एक व्यक्ति के पास 19 ऊंट थे। एक दिन उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। मृत्यु के पश्चात वसीयत पढ़ी गयी। जिसमें लिखा था कि:मेरे 19 ऊंटों में से आधे मेरे बेटे को,19 ऊंटों में से एक चौथाई मेरी बेटी को, और 19 ऊंटों में से पांचवाँ हिस्सा मेरे नौकर को दे दिए जाएँ।सब लोग चक्कर में पड़ गए कि ये बँटवारा कैसे हो ?19 ऊंटों का आधा अर्थात एक ऊँट काटना पड़ेगा, फिर तो ऊँट ही मर जायेगा। चलो एक को काट दिया तो बचे 18 उनका एक चौथाई साढ़े चार- साढ़े चार. फिर?सब बड़ी उलझन में थे। फिर पड़ोस के गांव से एक बुद्धिमान व्यक्ति को बुलाया गया।वह बुद्धिमान व्यक्ति अपने ऊँट पर चढ़ कर आया, समस्या सुनी, थोडा दिमाग लगाया, फिर बोला इन 19 ऊंटों में मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो।सबने सोचा कि एक तो मरने वाला पागल था, जो ऐसी वसीयत कर के चला गया, और अब ये दूसरा पागल आ गया जो बोलता है कि उनमें मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो। फिर भी सब ने सोचा बात मान लेने में क्या हर्ज है।19+1=20 हुए।20 का आधा 10, बेटे को दे दिए।20 का चौथाई 5, बेटी को दे दिए।20 का पांचवाँ हिस्सा 4, नौकर को दे दिए।10+5+4=19 बच गया एक ऊँट, जो बुद्धिमान व्यक्ति का था...वो उसे लेकर अपने गॉंव लौट गया।इस तरह 1 उंट मिलाने से, बाकी 19 उंटो का बंटवारा सुख, शांति, संतोष व आनंद से हो गया।सो हम सब के जीवन में भी 19 ऊंट होते हैं।5 ज्ञानेंद्रियाँ(आँख, नाक, जीभ, कान, त्वचा)5 कर्मेन्द्रियाँ(हाथ, पैर, जीभ, मूत्र द्वार, मलद्वार)5 प्राण(प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान)और4 अंतःकरण(मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार)कुल 19 ऊँट होते हैं। सारा जीवन मनुष्य इन्हीं 19 ऊँटो के बँटवारे में उलझा रहता है।और जब तक उसमें मित्र रूपी ऊँट नहीं मिलाया जाता यानी के दोस्तों के साथ.... सगे-संबंधियों के साथ जीवन नहीं जिया जाता, तब तक सुख, शांति, संतोष व आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती।

Monday, 20 January 2020

भोले नाथ

शंकर भोले नाथ का, रोज करे अभिषेक।
सिर पर धरते हाथ शिव, देते बुध्दि विवेक ।।

होने को अभिषेक था, हुआ राम वनवास।
रोते हैं नर नारियाँ, सरयू अवध उदास ।।

लंका पति के बाद में,मिला विभीषण ताज ।
किया राम अभिषेक है,दिया लंक का राज ।।

अभिषेक किये श्याम ने, मित्र सुदामा जान ।
वैभव तीनों लोक का, दिये कृष्ण भगवान ।।

भस्म से अभिषेक हो, महाकाल के भाल।
पल में विपदा टालते, हैं कालों के काल ।।

Monday, 13 May 2019

माता गुरूतरा भूमेः

माता गुरूतरा भूमेः
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महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठिर से सवाल करते हैं कि 'भूमि से भारी कौन?' तब युधिष्ठर जवाब देते हैं, 'माता गुरूतरा भूमेः युधिष्ठिर द्वारा माँ के इस विशिष्टता को प्रतिपादित करना यूं ही नहीं है आप अगर वेद पढ़ेंगें तो वेद माँ की महिमा बताते हुए कहती है कि माँ के आचार-विचार अपने शिशु को सबसे अधिक प्रभावित करतें हैं. इसलिये संतान जो कुछ भी होता है उसपर सबसे अधिक प्रभाव उसकी माँ का होता है. माँ धरती से भी गुरुत्तर इसलिये है क्योंकि उसके संस्कारों और शिक्षाओं में वो शक्ति है जो किसी भी स्थापित मान्यता, धारणाओं और विचारों की प्रासंगिकता खत्म कर सकती है.

इन बातों का बड़ा सशक्त उदाहारण हमारे पुराणों में वर्णित माँ मदालसा के आख्यान में मिलता है. मदालसा राजकुमार ऋतुध्वज की पत्नी थी. ऋतुध्वज एक बार असुरों से युद्ध करने गये, युद्ध में इनकी सेना असुर पक्ष पर भारी पड़ रही थी, ऋतुध्वज की सेना का मनोबल टूट जाये इसलिये मायावी असुरों ने ये अफवाह फैला दी कि ऋतुध्वज मारे गये हैं. ये खबर ऋतुध्वज की पत्नी मदालसा तक भी पहुँची तो वो इस गम को बर्दाश्त नहीं कर सकी और इस दुःख में उसने अपने प्राण त्याग दिये. इधर असुरों पर विजय प्राप्त कर जब ऋतुध्वज लौटे तो वहां मदालसा को नहीं पाया. मदालसा के गम ने उन्हें मूर्छित कर दिया और राज-काज छोड़कर अपनी पत्नी के वियोग में वो विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करने लगे. ऋतुध्वज के एक प्रिय मित्र थे नागराज. उनसे अपने मित्र की ये अवस्था देखी न गई और वो हिमालय पर तपस्या करने चले गये ताकि महादेव शिव को प्रसन्न कर सकें. शिव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो नागराज ने उनसे अपने लिये कुछ न मांग कर अपने मित्र ऋतुध्वज के लिये मदालसा को पुनर्जीवित करने की मांग रख दी. शिवजी के वरदान से मदालसा अपने उसी आयु के साथ मानव-जीवन में लौट आई और पुनः ऋतूध्वज को प्राप्त हुई.

मृत्यु के पश्चात मिले पुनर्जीवन ने मदालसा को मानव शरीर की नश्वरता और जीवन के सार-तत्व का ज्ञान करा दिया था, अब वो पहले वाली मदालसा नहीं थी लेकिन उसने अपने व्यवहार से इस बात को प्रकट नहीं होने दिया. पति से वचन लिया कि होने वाली संतानों के लालन-पालन का दायित्व उसके ऊपर होगा और पति उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगें. मदालसा गर्भवती हुई तो अपने गर्भस्थ शिशु को संस्कारित करने लगी. उसे भी वो ज्ञान देने लगी जिस ज्ञान से वो स्वयं परिपूर्ण थी. वो अपने गर्भस्थ शिशु को लोरी सुनाते हुये कहती थी कि ऐ मेरे बेटे, तू शुद्ध है, बुद्ध है, संसार की माया से निर्लिप्त है. एक के बाद एक तीन पुत्र हुए, पिता क्षत्रिय थे, उनकी मान्यता थी कि पुत्रों का नाम भी क्षत्रिय-गुणों के अनुरूप हो इसलिये उस आधार पर अपने पुत्रों का नाम रखा, विक्रांत, सुबाहू और शत्रुमर्दन. उसके सारे पुत्र मदालसा से संस्कारित थे, मदालसा ने उन्हें माया से निर्लिप्त निवृतिमार्ग का साधक बनाया था इसलिये सबने राजमहल त्यागते हुये संन्यास ले लिया. पिता बड़े दु:खी हुये कि ऐसा हुआ तो कैसे चलेगा. मदालसा फिर से गर्भवती हुई तो पति ने अनुरोध किया कि हमारी सब संतानें अगर निवृतिमार्ग की पथिक बन गई तो ये विराट राज-पाट को कौन संभालेगा इसलिये कम से कम इस पुत्र को तो राजकाज की शिक्षा दो. मदालसा ने पति की आज्ञा मान ली. जब चौथा पुत्र पैदा हुआ तो पिता अपने पहले तीन पुत्रों की तरह उसका नाम भी क्षत्रियसूचक रखना चाहते थे जिसपर मदालसा हँस पड़ी और कहा, आपने पहले तीन पुत्रों के नाम भी ऐसे ही रखे थे उससे क्या अंतर पड़ा फिर इसका क्षत्रियोचित नाम रखकर भी क्या हासिल होगा. राजा ऋतुध्वज ने कहा, फिर तुम  ही इसका नाम रखो. मदालसा ने चौथे पुत्र को अलर्क नाम दिया और उसे राजधर्म और क्षत्रियधर्म की शिक्षा दी.

अलर्क दिव्य माँ से संस्कारित थे इसलिये उनकी गिनती सर्वगुणसंपन्न राजाओं में होती है. उन्हें राजकाज की शिक्षा के साथ माँ ने न्याय, करुणा, दान इन सबकी भी शिक्षा दी थी. वाल्मीकि रामायण में आख्यान मिलता है कि एक नेत्रहीन ब्राह्मण अलर्क के पास आया था और अलर्क ने उसे अपने दोनों नेत्र दान कर दिये थे. इस तरह अलर्क विश्व के पहले नेत्रदानी हैं. इस अद्भुत त्याग की शिक्षा अलर्क को माँ मदालसा के संस्कारों से ही तो मिली थी.

बालक क्षत्रिय कुल में जन्मा हो तो ब्रह्मज्ञानी की जगह रणकौशल से युक्त होगा, नाम शूरवीरों जैसे होंगें तो उसी के अनुरूप आचरण करेगा इन सब स्थापित मान्यताओं को मदालसा ने एक साथ ध्वस्त करते हुए दिखा दिया कि माँ अगर चाहे तो अपने बालक को शूरवीर और शत्रुंजय बना दे और वो अगर चाहे तो उसे धीर-गंभीर, महात्मा, ब्रह्मज्ञानी और तपस्वी बना दे. अपने पुत्र को एक साथ साधक और शासक दोनों गुणों से युक्त करने का दुर्लभ काम केवल माँ का संस्कार कर सकता है जो अलर्क में माँ मदालसा ने भरे थे. स्वामी विवेकानंद ने यूं ही नहीं कहा था कि अगर मेरी कोई संतान होती तो मैं जन्म से ही उसे मदालसा की लोरी सुनाते हुये कहता, त्वमअसि निरंजन...

भारत की धरती मदालसा की तरह अनगिनत ऐसे माँओं की गाथाओं से गौरवान्वित है जिसने इस भारत भूमि और महान हिन्दू धर्म को चिरंजीवी बनाये रखा है. ये यूं ही नहीं है कि परमेश्वर और देवताओं की अभ्यर्चनाओं से भरे ऋग्वेद में ऋषि वो सबकुछ माँ से मांगता है जिसे प्रदत्त करने के अधिकारी परमपिता परमेश्वर को माना जाता है, ऋषि माँ से अभ्यर्चना करते हुए कहता है,

हे उषा के समान प्राणदायिनी माँ. हमें महान सन्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करो, तुम हमें नियम-परायण बनाओं और हमें यश तथा अद्भुत ऐश्वर्य प्रदान करो.

माँ की महिमा का इससे बड़ा प्रमाण और कहीं मिलेगा ?
✍🏻
~ अभिजीत सिंह

बहुत समय पहले जब विदेशों में पोस्ट ऑफिस की शुरुआत हुई तो एक बहुत बड़ा वर्ग इसके विरोध में खड़ा हो गया | उनका मानना था कि पोस्ट ऑफिस के जरिये महिलाएं बिना घर के लोगों की जानकारी के यहाँ वहां चिट्ठियां भेजा करेंगी | इस तरह उनके “चरित्रहीन” हो जाने का “खतरा” बहुत बढ़ जायेगा !

लड़कियों के चिट्ठी लिखने पर तो छोड़िये, लड़कियों के पढ़ने लिखने पर भी सदियों तक पाबन्दी रही है |

ऐसे में ये भी याद आता है कि “थेरीगाथा” ऐसा पहला ग्रन्थ है जो सिर्फ महिलाओं द्वारा लिखा गया | इसे 600 BCE में भारत में ही लिखा गया था | कई अलग अलग महिलाओं ने इस काव्य संकलन में अपना योगदान दिया है | एक कविता किसी गणिका की है, एक धन-दौलत छोड़कर बौद्ध भिक्षुणी बन गई महिला की भी है | एक कविता तो गौतम बुद्ध की सौतेली माता की भी है |

हमेशा से विदुषियों के देश रहे भारत की जनता को मातृ दिवस की शुभकामनायें !

वैदिक महिला विद्वानो में शिक्षिकाओ का जिक्र है इनके लिखे मंत्र है।
लोपामुद्रा, गार्गी, घोषा, मैत्रेय , लोपामुद्रा , भारती , अपाला आदि इनमे मुख्य है। योद्धाओं में कैकेई , विश्पला , आदि ।

आनन्दी गोपाल जोशी 1865 मे पैदा हुई MD डाक्टर थी।

कादम्बनी गांगुली 1861 मे पैदा हुई MBBS डाक्टर थी।

चंद्रमुखी वसु को 1882 मे ग्रेजुएट डिग्री मिली थी।

सरोजनी (चटोपाध्याय) नायडू born 1879 सुप्रसिद्ध कवित्री थी। 1947 मे सयुक्त प्रांत ( अब UP) की गवर्नर थी।

आजादी की लडाई मे भाग लेने वानी अनोको अनगिनत पढी लिखी महिलाये है जिनमे भीखाजी कामा रूस्तम, प्रितिला वाड्डेदार, विजयालक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, अरूणा आसिफ अली, सुचेता कृपलानी, मुत्थुलक्ष्मी रेड्डी, दुर्गाबाई देशमुख, कैप्टिन लक्ष्मी सहगल आदि और जाने कितनी ही अनगिनत है।
सरला (शर्मा) ठकराल 1936 मे विमान पायलेट का थी।

जाॅन बेथुन ने 1849 मे कोलकाता मे पहले केवल महिलाओ के लिये कालेज की स्थापना की थी।

1916 मे मुम्बई मे पहली महिला यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई थी जिसके तीन कैम्पस थे। और अनेक महिला कालेज इससे सम्बधित भी हुई।

पंडिता रमाबाई को शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र मे योगदान के लिये ब्रिटिश सरकार द्वारा 1919 मे केसरी ए हिन्दी मेडल दिया गया था।

6 फरवरी 1932 को बीना दास ने कन्वोकेशन मे डिग्री लेते समय ही गवर्नर को गोली मारी थी।

इसके अलावा अंग्रेजी समय और मध्य काल मे भी विभिन्न रियसतो और राज्यो की शासक महिलाये हुई है। जिन्होने सेना की कमान भी सभाली और विभिन्न युद्धो मे भाग भी लिया।
संविधान बनने के समय मे संविधान सभा मे भी अनेको पढी लिखी महिला मेम्बर भी थी। जिनमे कि हंसा मेहता ने हिन्दू कोड बिल सदन मे रखते ही अम्बेडकर को महिलाओ के प्रति दुराग्रह और बिल मे कमियो को लेकर लताड भी लगाई थी।
फिर भी कुछ आरक्षण से आधे पढे लिखे विद्वान इस तरह का दावा करते फिरते है मानो 1950 से पहले इस देश मे कोई पढी लिखी स्त्री नही थी। ।
जबकि 1951 की जनगणना मे इस देश मे साक्षर लोगो की संख्या ही 15% थी। मतलब की पढे लिखे लोग 1951 तक 4-5% से अधिक नही थे। महिलाये ही नही पूरे देश मे पढे लिखे लोगो की कुल संख्या ही बहुत कम थी। इन आरक्षित अनपढ लोगो ने इन्टरनेट पर गलत जानकारी का अम्बार लगाया हुआ है ।

राजा सर्फोजी भोसले 1798 से 1832 तक तन्जौर के महाराजा रहे। इन्होने धनवन्त्री महल नामक अस्पताल खोला। मेडिकल साइन्स की कई आधुनिक रिसर्च की।
इन्होने महिलाओ की शिक्षा के लिये स्कूल कालेज खोले जिनमे की केवल महिलायें ही शिक्षक थी।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा, रानी अब्बक्का जैसी अंग्रेजों की गुलामी से ठीक पहले की रानियों का जिक्र होते ही एक सवाल दिमाग में आता है | युद्ध तलवारों से, तीरों से, भाले – फरसे जैसे हथियारों से लड़ा जाता था उस ज़माने में तो ! इनमे से कोई भी 5-7 किलो से कम वजन का नहीं होता | इतने भारी हथियारों के साथ दिन भर लड़ने के लिए stamina भी चाहिए और training भी |

रानी के साथ साथ उनकी सहेलियों, बेटियों, भतीजियों, दासियों के भी युद्ध में भाग लेने का जिक्र आता है | इन सब ने ये हथियार चलाने सीखे कैसे ? घुड़सवारी भी कोई महीने भर में सीख लेने की चीज़ नहीं है | उसमे भी दो चार साल की practice चाहिए | ढेर सारी खुली जगह भी चाहिए इन सब की training के लिए | Battle formation या व्यूह भी पता होना चाहिए युद्ध लड़ने के लिए, पहाड़ी और समतल, नदी और मैदानों में लड़ने के तरीके भी अलग अलग होते हैं | उन्हें सिखाने के लिए तो कागज़ कलम से सिखाना पड़ता है या बरसों युद्ध में भाग ले कर ही सीखा जा सकता है |

अभी का इतिहास हमें बताता है की पुराने ज़माने में लड़कियों को शिक्षा तो दी ही नहीं जाती थी | उनके गुरुकुल भी नहीं होते थे ! फिर ये सारी महिलाएं युद्ध लड़ना सीख कैसे गईं ? ब्राम्हणों के मन्त्र – बल से हुआ था या कोई और तरीका था सिखाने का ?

लड़कियों की शिक्षा तो नहीं होती थी न ? लड़कियों के गुरुकुल भी नहीं ही होते थे ?

Friday, 2 November 2018

जब लंकाधीश रावण पुरोहित बना ...

जब लंकाधीश रावण पुरोहित बना ..."

(अद्भुत प्रसंग, भावविभोर करने वाला प्रसंग)

बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी *महर्षि कम्बन की #इरामावतारम्'* मे यह कथा है।

रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव है..।

जब श्री राम ने खर-दूषण का सहज ही बध कर दिया तब तुलसी कृत मानस में भी रावण के मन भाव लिखे हैं--

         खर दूसन मो   सम   बलवंता ।
         तिनहि को मरहि बिनु भगवंता।।

रावण के पास जामवंत जी को #आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..।
जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा। स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।

रावण ने सविनय कहा–   "आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।"

जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है।
" मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।"

प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया

  "क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?"

"बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है. I"

जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दे?

रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा –" आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।"

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।

अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है।

" .यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। "

स्वामी का आचार्य अर्थात स्वयं का आचार्य।
यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया।
. स्वस्थ कण्ठ से "सौभाग्यवती भव" कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरे ।

" आदेश मिलने पर आना" कहकर सीता को उन्होंने  विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचे ।

जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

" दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! "

दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया ।

सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उन्होंने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।

भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा

" यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।"

श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।

" अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम संन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?"

" कोई उपाय आचार्य ?"

                           
" आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।"

श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया। श्री रामादेश के परिपालन में. विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।
           
" अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान ..."

आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया।
गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा - लिंग विग्रह ?

यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।

आचार्य ने आदेश दे दिया - " विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालू का लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।"

                     
जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित किया ।

     यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्री सीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया।

आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।.

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की..

     श्रीराम ने पूछा - "आपकी दक्षिणा ?"

पुनः एक बार सभी को चौंकाया। ... आचार्य के शब्दों ने।

" घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है ..."

" लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य की जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।"

"आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे ....." आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।
         

"ऐसा ही होगा आचार्य।" यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी--
         
            “रघुकुल रीति सदा चली आई ।
            प्राण जाई पर वचन न जाई ।”
                      
यह दृश्य वार्ता देख सुनकर उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।
                 

रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है ?

(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी )